पटना SSP के फोन कीं घंटी बजती है, लाइन पर थे बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री! मुख्यमंत्री ने SSP से कुछ सवाल पूछे, जिसके जवाब में SSP के बोल थे- “सर, आप इस मामले में मत पड़िए, इसमें इतनी तेज आग है की आपके हाथ जल जाएँगे!”
मुख्यमंत्री ने चुपचाप फोन रख दिए।
आज कहनी में बिहार के सबसे चर्चित Super cop रहे IPS अधिकारी की जिसने मुख्यमंत्री तक को हड़काया, जिसने बड़े-बड़े Don तक कीं परेड करा दी। नाम था उनका “किशोर कुणाल” और जो तत्कालीन मुख्यमंत्री थे, उनका नाम था जगन्नाथ मिश्रा!
श्वेतानिशा त्रिवेदी, जो तत्कालीन विधान परिषद में एक टाइपिस्ट थी। उस समय के तत्कालीन विधानपरिषद के सभापति की गोद ली हुई बेटी भी थी। फेमस नाम था बॉबी!
8 मई 1983 को बॉबी की संदिग्ध हालत मे मृत्यु हुई और 4 घंटे के अंदर शरीर को आनन-फ़ानन दफ़ना दिया गया।
ख़बर तुल पकड़ीं, अख़बार की सुर्ख़ियाँ बनी, SSP किशोर कुणाल ने इसी खबर के आधार पर जाँच शुरू की और अदालत से आदेश लेकर, बॉबी की कब्र खोद कर लाश निकाली गई और उसे जाँच के लिए भेजा गया। बिहार से लेकर पूरे देश में हड़कंप मच गया। बिहार के मंत्री, विधायक यहाँ तक मुख्यमंत्री तक की कुर्सी हिल गई!
जाँच के रिपोर्ट आए, जिसमें कहा गया की उनकी मौत मैलाथियान नामक ज़हरीली कीटनाशक के कारण हुई। नेताओं के हाथ-पैर फुलने लगे। इतना दबाव बना की केस किशोर कुणाल से लेकर CBI को सौंप दिया गया…..
CBI ने बाद मे कहा की यह हत्या नहीं आत्महत्या है और सभी दोषियों को क्लीन चिट दे दिया। इस कांड में कांग्रेस नेता राधानंदन झा के बेटे रघुवर झा का नाम प्रमुखता से सामने आया था।
बाद में किशोर कुणाल ने अपनी पुस्तक “दमन तक्षकों का” में लिखते हैं की कैसे मुख्यमंत्री पर दबाव बना 44 विधायक और 2 मंत्री ने केस को CBI को ट्रांसफ़र करवाया।
अब कहानी को दुसरी तरफ मोड़ते हैं। सादे लिबास में ट्रेन से सफ़र कर रहे कुणाल कुछ यात्रियों की की बातें सुनी यात्री कह रहे थे- इस मंदिर की बदहाली को कौन ठीक करेगा, आए दिन यहाँ चढ़ावे चोरी ही हो जाते हैं। जो इस मंदिर को ठीक करेगा वही असल मायने में सुधारक होगा। इसे किशोर कुणाल बड़े ध्यान से सुन रहे थे, फिर मन ही मन संकल्प लिया।
30 अक्टूबर 1983 को मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ हुआ……… And rest is history!
आज जब बिहार में अनेकों कांड होते देखता हूँ और पुलिस मूक दर्शक और नेताओं के इशारे पर चलने वाले बस कठपुतली बने रहते हैं तो किशोर कुणाल की पुलिसिंग याद आती है।

