श्री बच्चू सिंह मीणा, IPS आज सेवा -निवृत्त हो रहे हैं.इनके दुर्भाग्य और मेरे सौभाग्य से मुझे इनके साथ काम करने का मौका मिला था. ये बिहार के नहीं राजस्थान की मीणा जाति के थे जो एसटी मानी जाती है.राजस्थानी में मीणा का अर्थ भेड़ होता है, लेकिन श्री बच्चू सिंह मीणा तो बब्बर शेर थे
मेरी उनसे पहली मुलाक़ात तब हुईं थी जब उनकी पोस्टिंग बी एम पी 13 में हुईं थी.मुझे ठीक से याद तो नहीं है, लेकिन इतना तो निश्चित है कि बी एम पी में योगदान देने के पूर्व वे सर्किट हाउस में नहीं ठहरे थे.शायद पी डब्ल्यू डी का गेस्ट हाउस था जहाँ मैं सहायक समादेष्टा के रूप में उनसे मिलने गया था. उस समय मेरे दिमाग़ में यह प्रश्न नहीं कौँधा था कि एक आई पी एस पदाधिकारी सर्किट हाउस की जगह PWD के गेस्ट हाउस में क्यों ठहरा था. लेकिन योगदान के बाद उनसे बातचीत के क्रम में मालूम हुआ कि एसपी, डीएम लालू और उनके द्वारा पोषित गुंडे शहाबुद्दीन के डर से उनसे दूरी बनाकर रहना चाहते थे.उन्होंने एक दिन यह भी कहा था कि सचिवालय के कोल्ड स्टोरेज में बैठे आई पी एस ऋतराज जी ने उन्हें काफी मानसिक सहयोग दिया था . ऋतुराज बाबू नालंदा जिले के मुरारपुर गाँव के भूमिहार थे और लालू की दोगली नीति से आहत हो उन्होंने नौकरी से रिजाइन कर दिया था
मुझे तो मीणा साहब बहुत मानते थे. तभी तो सेवा निवृत्ति के बाद भी विशेष शाखा के ए डी जी की हैसियत से वे करीब 4वर्षों तक मुझे पुलिस बडीगार्ड देते रहे थे.
शहाबुद्दीन के आतंक बिहार पुलिस अफसरों पर भी व्याप्त थे. मुझे याद है कि तत्काल दरभंगा एसपी नें (नाम नहीं बताऊंगा ) जो मेरे स्वजातीय ही थे, मुझसे कहा था कि मीणा को शहाबुद्दीन छोड़ेगा नहीं. यदि हिम्मत है तो वह राजस्थान से अपना परिवार जाकर ले आये. मुझे आश्चर्य हुआ यह सुनकर, क्योंकि एक पुलिस अधीक्षक के ह्रदय में एक अपराधी का खौफ मेरी समझ से बाहर था. आपको बता दूँ कि जिस समय दरभंगा एसपी मुझसे यह बात बता रहे थे, उस समय मीणा साहब की पत्नी दरभंगा आने के लिए ट्रेन पर बैठी थी.
समादेष्टा महोदय से मुलाक़ात के समय मुझे अहसास हुआ कि वे बिहार में अपने को अकेले और अजनबी महसूस कर रहे हैं.शायद भीतर ही भीतर वे टूटते से दिख रहे थे.. उस समय समादेष्टा के लिए सरकार के स्तर से जिप्सी मुहैया कराई गयी थी. जिप्सी में समादेष्टा को ड्राइवर के बगल वाली सीट में बैठना होता था और 1-4 का गार्ड जिप्सी के पिछले भाग में बैठता था. मीणा साहब नें अपने लिए जिप्सी के बीच वाले हिस्से में 3 सीटर की व्यवस्था कर ली थी.सुरक्षा की दृष्टि से यह एक बेहतर अरेंजमेंट था.श्री मीणा एक बहादुर जाम्बाज अफसर थे और बहादुर आदमी अपनी आत्मरक्षा के प्रति आसावधान नहीं रहता.
BMP 13 में एसपी का अपना कोई आवास नहीं था. बस कैम्पस में स्थित हॉस्पिटल के ही एक हिस्से में समादेष्टा का आवास निर्धारित कर दिया था जिसमें बाउंड्री नहीं थी. आवास से महज सौ गज की दूरी पर आम रास्ता था जहाँ से आसानी से किसी को गोली का शिकार बनाया जा सकता था. शहाबुद्दीन द्वारा मीणा साहब को दी गयी धमकियां अख़बार की सुर्खी बनती रही थी अतः मीणा साहब के कुछ कहे बिना ही मैंने निश्चय किया कि एक बाउंड्री का निर्माण किया जाना चाहिए ।लेकिन मेरे पास तो अपने पैसे नहीं थे ।
मैंने BMP कर्मियों, सिपाही, एएसआई , एसआई, सार्जेन्ट मेजर आदि की एक मीटिंग बुलाई और प्रस्ताव रखा कि हमारे जाम्बाज समादेष्टा महोदय को सरकार नें BMP-13 में अपमानित करने के लिए भेजा है । हमें उनके मनोबल को बढ़ाना है, क्योंकि श्री मीणा का अपमान पूरे विभाग का अपमान है। मैंने प्रस्ताव रखा कि आपलोग यदि कन्ट्रीब्यूट करें तो समादेष्टा महोदय के आवास को सम्मानजनक रूप दिया जा सकता है । सभी लोगों नें एक स्वर से सहमति जाहिर की और अपने वेतन से स्वेच्छया कटौती करवाकर इतनी रकम इकठ्ठा करवा दी कि आवास की बाउंड्री समेत सुख सुविधा के अनेक संसाधन प्राप्त किये जा सके ।
सारी व्यवस्था के बाद मैंने दरभंगा काली मंदिर से जुड़े करीब ग्यारह ब्राह्मणों को निमंत्रित किया ताकि गृह प्रवेश की हिन्दु रीति के साथ मंत्रोच्चार के बीच समादेष्टा महोदय को उनके आवास में प्रविष्ट कराया जा सके, हालाँकि सच यह है कि मैं कर्मकांड और पूजा पाठ में विश्वास नहीं करता हूँ. लेकिन मैंने कर्मकांड का सारा आयोजन किया सिर्फ इसलिए कि मीणा साहब को अहसास हो कि बिहार सिर्फ लालू और शहाबुद्दीन की बपौती नहीं है, यह कि यहाँ भूमिहार सहित अनेक जातियाँ हैं जो लालू को चुनौती देने के लिएलगातार लड़ रही हैं..इस तरह गृह प्रवेश हुआ था और उस समय सारा माहौल सांस्कृतिक हो उठा था । शायद यह सब लालू यादव और शहाबुद्दीन को पुलिस विभाग द्वारा दिए गए जवाब की तरह था ।
ऐसे जितना भी,जो भी भांज ले, लेकिन सच यही है कि शहाबुद्दीन के किले को भेदकर कानून और कानून के बाहुबल पुलिस की हनक का पहला और सबसे जोरदार प्रदर्शन श्री बच्चू सिंह मीणा ने ही किया था और वह भी उस समय जबकि राजद की सरकार थी और शहाबुद्दीन को MY समीकरण का सबसे बड़ा पालतू कुत्ता माना जाता था । AK-47 थामे शहाबुद्दीन के आतंकवादी गुर्गे ढूंढ़ ढूंढ़ कर मार डाले गए थे. जो बच गए थे वे बकरी की तरह मिमिया रहे थे शहाबुद्दीन तो बुर्के में छिपकर भाग निकला था।
शहाबुद्दीन से मुठभेड़ के बाद श्री बच्चू सिंह मीणा ने करीब तीन महीने पदस्थापन की प्रतीक्षा में BMP -5 के गेस्ट हॉउस में बिताये और फिर पोस्टिंग भी हुईं तो उस बी एम पी में जहाँ सिपाहियों नें विद्रोह कर समादेष्टा और उपाधीक्षक को भी पीट दिया था.
लेकिन उसी बी एम पी से जब मीणा साहब की विदायी हुईं, तब वहाँ के पुलिस कर्मियों नें अश्रुपूर्ण लहजे में यह गाया था –
जला अस्थियाँ बारी-बारी
छिटकाई जिनने चिनगारी,
जो चढ़ गये अस्थि -वेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

