तेरहवीं का दिन था। घर लोगों से भरा हुआ था।
लेकिन उस भीड़ में भी एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। आंगन में पंडित मंत्र पढ़ रहे थे, रिश्तेदार धीरे-धीरे बातें कर रहे थे, और रसोई में बर्तन खनकने की आवाजें आ रही थीं… लेकिन इन सबके बीच 15 साल का आर्यन एक कोने में चुपचाप बैठा था।
उसकी आंखें कहीं दूर टिकी थीं, जैसे वो इस दुनिया में होकर भी इस दुनिया में नहीं था।
पास ही उसका छोटा भाई, 12 साल का शुभ, लोगों के बीच खड़ा था। कभी किसी के पास जाता, कभी चुपचाप खड़ा रह जाता। उसकी आंखों में डर साफ दिख रहा था—जैसे वो किसी अपने को खोज रहा हो, जो अब इस दुनिया में नहीं था।
आर्यन ने धीरे से अपनी आंखें बंद कीं… और मन ही मन मां से बात करने लगा—
“मां… मैं अभी बहुत छोटा हूं मां… सब बोल रहे हैं कि मैं बड़ा हो गया हूं… सब संभाल लूंगा… अपना और छोटे का ध्यान रख लूंगा… लेकिन कैसे मां? कैसे रख लूंगा?”
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, लेकिन उसने उन्हें पोंछा नहीं। जैसे वो चाहता था कि ये दर्द बहता ही रहे।
“मां… मैं तो अभी सिर्फ 15 साल का हूं… मुझे तो ये भी नहीं पता कि घर कैसे चलता है… पैसे कहां से आते हैं… खर्च कैसे संभालते हैं… आप और पापा ने मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी मां…”
उसकी आवाज मन में ही कांप रही थी।
“आप तो दो साल पहले ही चली गई थीं… तब पापा थे हमारे साथ… उन्होंने कभी आपकी कमी महसूस नहीं होने दी… हर सुबह मुझे डांट कर उठाते थे… कहते थे ‘आर्यन, देर हो रही है स्कूल के लिए’… और मैं गुस्सा करता था… लेकिन आज… आज वही डांट सुनने के लिए दिल तरस रहा है मां…”
उसके होंठ कांपने लगे।
“मां… आपने पापा को भी अपने पास बुला लिया… क्या हम इतने बुरे बच्चे हैं मां? क्या हमसे कोई गलती हो गई थी… जो हमारे सिर से मां-बाप दोनों का साया छिन गया?”
पास ही किसी ने हंसते हुए कुछ कहा, लेकिन आर्यन को कुछ सुनाई नहीं दिया। उसकी दुनिया तो उस कोने में ही सिमट गई थी।
“मां… आज दादाजी बोल रहे थे कि पापा के अंतिम संस्कार में जो खर्चा हुआ है… उसे चुकाने के लिए हमारी जमीन बेचनी पड़ेगी… क्योंकि किसी ने मदद नहीं की…”
उसने एक गहरी सांस ली।
“मां… मुझे समझ नहीं आ रहा… मैं अपने और शुभ के खर्चे कैसे उठाऊंगा… स्कूल की फीस कैसे भरूंगा… घर कैसे चलाऊंगा…”
कुछ पल के लिए वो चुप हो गया।
फिर धीरे से उसके चेहरे पर हल्की सी दृढ़ता आई—
“मां… मैंने सोचा है… मैं छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाऊंगा… थोड़ा-थोड़ा पैसा आ जाएगा… उसी से हमारा खाना-खर्चा चल जाएगा… और पापा की जो गाड़ी है… उसे बेच दूंगा… उससे इस साल की फीस भर दूंगा…”
उसकी आवाज भर्रा गई—
“और अगले साल… मैं अपना एडमिशन सरकारी स्कूल में करा लूंगा… ताकि शुभ की पढ़ाई ना रुके… वो अच्छे स्कूल में ही पढ़ेगा मां… उसे कोई कमी नहीं होने दूंगा…”
उसकी आंखों के सामने शुभ का मासूम चेहरा घूम गया।
“मां… मुझे तो खाना बनाना भी नहीं आता… कपड़े धोना भी नहीं आता… ये सब कैसे करूंगा मैं…? सुबह खुद उठूंगा… शुभ को भी उठाऊंगा… उसका टिफिन बनाऊंगा… उसे स्कूल भेजूंगा… लेकिन मां… ये सब कैसे सीखूंगा?”
अब उसके आंसू रुक नहीं रहे थे।
“मां… मेरी तो नींद भी नहीं खुलती थी बिना पापा की डांट के… अब कौन डांट कर उठाएगा मुझे…? कौन पूछेगा कि साइकिल ठीक है या नहीं…? कौन बोलेगा कि जल्दी सो जाओ…?”
उसने सिर झुका लिया।
“मां… सब बोल रहे हैं कि ‘बड़ा बेटा है, सब संभाल लेगा’… लेकिन मां… कोई ये क्यों नहीं समझता कि बड़ा बेटा भी तो अभी बच्चा ही है…”
उसके दिल में जैसे कुछ टूट गया।
उसी समय उसकी नजर शुभ पर पड़ी। शुभ एक कोने में खड़ा था, उसकी आंखें लाल थीं। वो किसी से कुछ कह नहीं पा रहा था… बस भीड़ में खुद को अकेला महसूस कर रहा था।
आर्यन धीरे से उठा और उसके पास गया। उसने शुभ के कंधे पर हाथ रखा।
शुभ ने जैसे ही अपने भाई को देखा, वो तुरंत उससे लिपट गया—
“भैया… पापा कब आएंगे…?”
ये सवाल सुनकर आर्यन का दिल चीर गया। उसने खुद को संभालते हुए शुभ को सीने से लगा लिया।
उसने आंखें बंद कीं… और फिर मन ही मन मां से कहा—
“मां… आज मैं सच में अनाथ हो गया… लेकिन मैं शुभ को अनाथ नहीं होने दूंगा…”
उसकी पकड़ और मजबूत हो गई।
“मां… आज से मैं ही उसका मां हूं… मैं ही उसका पापा हूं… मैं ही उसका बड़ा भाई हूं… उसे कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा… चाहे मुझे कितनी भी मुश्किलों का सामना करना पड़े…”
अब उसकी आंखों में आंसुओं के साथ एक अजीब सी ताकत भी थी।
“मां… आप बस अपना आशीर्वाद देना… मैं टूटूंगा नहीं… मैं रोऊंगा भी तो छुपकर… ताकि शुभ कभी कमजोर ना पड़े…”
उसने शुभ के सिर पर हाथ फेरा—
“तू चिंता मत कर… मैं हूं ना…”
शुभ ने कुछ नहीं कहा… बस अपने भाई के सीने में मुंह छुपा लिया।
आंगन में तेरहवीं के मंत्र पूरे हो चुके थे। लोग धीरे-धीरे जाने लगे थे। लेकिन उस छोटे से कोने में… एक 15 साल का बच्चा उसी दिन बड़ा हो गया था।
उसने अपने आंसू पोंछे… और आसमान की ओर देखा—
“मां… पापा… अब मैं संभाल लूंगा… सच में संभाल लूंगा… बस आप साथ देना…”
हवा का एक हल्का झोंका आया… जैसे किसी ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया हो।
और उस दिन… एक बच्चे ने अपना बचपन खोकर… अपने छोटे भाई के लिए पूरी दुनिया बनने का फैसला कर लिया।
Vandna Tripathi ✍️

