केंद्र सरकार ने बिना ट्रांस जेंडर समुदाय की सलाह मशविरा के 23 और 24 मार्च 2026 को संसद के दोनों सदनों में ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट बिल पेश कर उसे पारित कर दिया, जिसके बाद ट्रांसजेंडर समुदाय में गहरी चिंता और असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो गई है। समुदाय के कुछ लोगों को यह उम्मीद थी कि महामहिम राष्ट्रपति जी इस बिल पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी, लेकिन 30 मार्च 2026 को उनके द्वारा भी इस पर सहमति दे दी गई। इसके बाद ट्रांसजेंडर समुदाय के भविष्य को लेकर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है और आगे की दिशा को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
सरकार द्वारा प्रस्तुत इस बिल में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित करते हुए केवल “सोशियो-कल्चरल” समूहों और इंटरसेक्स व्यक्तियों तक ही मान्यता देने का प्रयास किया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि सोशियो-कल्चरल समूहों में वे लोग ही शामिल होते हैं, जो अपनी आत्म-पहचान (self-perceived gender identity) के आधार पर स्वयं को ट्रांस महिला के रूप में पहचानते हैं। ये वे लोग हैं जिनका जन्म पुरुष शरीर में हुआ, लेकिन बचपन से ही वे स्वयं को महिला के रूप में महसूस करते आए हैं।
जब ऐसे व्यक्तियों को परिवार, समाज और आसपास के वातावरण से स्वीकार्यता नहीं मिलती, उनके साथ भेदभाव और अत्याचार होता है, तो वे समाज से अलग होकर किन्नर समुदाय या डेरा परंपरा में शामिल हो जाते हैं। यह उनका चुनाव नहीं, बल्कि परिस्थितियों का परिणाम होता है। डेरा परंपरा में शामिल होना परिस्थितियों का परिणाम हो सकता है लेकिन जेंडर पहचान कल्पना या choice बिल्कुल नहीं है! प्रश्न उठता है कि क्या हम वायु, ध्वनि, आत्मा और परमात्मा को देख सकते हैं? उत्तर होगा- नहीं! लेकिन इन सबका अस्तित्व है और इसके बिना जीवन असंभव है ! इन सभी को हम व्यक्तिगत रूप से मेहसूस व अनुभव करते हैं! उसी प्रकार इंसान की व्यक्तिगत भावनाओं को हम वही इंसान खुद मेहसूस करता है जिस पर गुज़र रही होती है! दूसरा तो सिर्फ judge करता है!
सरकार को चाहिए था कि वह ट्रांसजेंडर समुदाय के सभी वर्गों—ट्रांस मेल, ट्रांस फीमेल, इंटरसेक्स, नॉन-बाइनरी और जेंडर फ्लुइड व्यक्तियों—को समान रूप से संरक्षण प्रदान करती। लेकिन इस बिल में ट्रांस मेल की पहचान को लगभग समाप्त कर दिया गया है। उन्हें न तो स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई है और न ही उनके अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। विशेष रूप से ट्रांस मेल और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों का सोशियो-कल्चरल समूहों में शामिल होना भी बहुत कम होता है, क्योंकि वे स्वयं को पुरुष या पारंपरिक लैंगिक ढांचे से अलग पहचानते हैं।
इस प्रकार, वर्तमान बिल में ट्रांसजेंडर की जो नई परिभाषा दी गई है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत व्यापक परिभाषा से मेल नहीं खाती। ट्रांसजेंडर एक व्यापक (broad) पहचान है, जिसमें विभिन्न जेंडर आइडेंटिटीज़ शामिल होती हैं, लेकिन इस बिल ने इसे अत्यंत संकीर्ण (narrow) बना दिया है।
यदि सरकार का उद्देश्य केवल किन्नर या हिजड़ा समुदाय को संरक्षण देना था, तो उसे उसी अनुरूप “किन्नर संरक्षण बिल” या “हिजड़ा बिल” के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। क्यूँ इसका नाम ट्रांसजेंडर व्यक्ति सुरक्षा अधिकार बिल रखा गया! “ट्रांसजेंडर बिल” नाम देने के बावजूद, यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक पहचान और उनके अधिकारों को समुचित रूप से संबोधित करने में असफल प्रतीत होता है।
सरकार की मंशा को लेकर समुदाय के भीतर गहरी आशंका व्यक्त की जा रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि पहले चरण में समाज के भीतर खुले रूप से अपनी पहचान के साथ जी रहे ट्रांस मेल, ट्रांस फीमेल, जेंडर क्वियर और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों की पहचान को कमजोर या समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बाद धीरे-धीरे सोशियो-कल्चरल ढांचे, विशेष रूप से हिजड़ा/किन्नर परंपरा, अपने आप कमजोर पड़ सकती है। क्योंकि इस परंपरा में भी मुख्यतः वे ट्रांस महिलाएँ ही शामिल होती हैं, जो सामाजिक बहिष्कार के कारण वहाँ जाती हैं। यदि ट्रांस महिलाओं की पहचान और अस्तित्व को ही खत्म कर दिया जाएगा, तो स्वाभाविक रूप से इस परंपरा में नए लोगों का आना भी बंद हो जाएगा, और समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ सकती है।
आज यदि किसी डेरे में दस लोग रहते हैं, तो भविष्य में नए सदस्यों के शामिल न होने से यह संख्या स्वाभाविक रूप से घटती जाएगी। अंततः, एक समय ऐसा आ सकता है जब यह पूरी परंपरा ही समाप्त हो जाए। इसी संदर्भ में सरकार द्वारा “गरिमा गृह” जैसे शेल्टर होम स्थापित करने की बात भी एक विरोधाभास उत्पन्न करती है। क्योंकि शेल्टर होम में वही लोग आते हैं, जिनकी जेंडर पहचान (Gender) और जैविक सेक्स (Sex) में असमानता (Mismatch) होती है, जिन्हें परिवार और समाज से अस्वीकार कर दिया जाता है, और जो हिंसा, भेदभाव तथा शोषण का सामना करते हैं। यदि उनकी पहचान को ही मान्यता नहीं दी जाएगी, तो फिर यह प्रश्न उठता है कि इन शेल्टर होम का लाभ कौन उठाएगा?
इंटरसेक्स व्यक्तियों की बात करें, तो उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से बहुत कम होती है। ऐसे में केवल इंटरसेक्स और सीमित सोशियो-कल्चरल पहचान को आधार बनाकर पूरी ट्रांसजेंडर परिभाषा तय करना व्यावहारिक नहीं लगता।
इसके अतिरिक्त, नए कानून के तहत जबरन भीख मंगवाने या किसी प्रकार की दीक्षा/परंपरा में शामिल करने पर कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। हालांकि इसका उद्देश्य शोषण रोकना हो सकता है, लेकिन इसके कारण एक भय का वातावरण भी बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से भी किसी डेरे में शामिल होता है, और भविष्य में किसी विवाद के चलते आरोप लगाता है, तो गुरु या संरक्षक के लिए गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। इस आशंका के कारण डेरा समुदाय नए लोगों को अपनाने से हिचक सकता है, जिससे यह परंपरा और अधिक कमजोर हो सकती है।
इस पूरी स्थिति से यह चिंता उभरकर सामने आती है कि कहीं यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सभी प्रकार की ट्रांसजेंडर पहचानों—चाहे वे सामाजिक हों या व्यक्तिगत—को समाप्त करने की दिशा में तो नहीं बढ़ रही। इससे न केवल एक समुदाय की सांस्कृतिक विरासत प्रभावित होगी, बल्कि उनके अस्तित्व और अधिकारों पर भी गहरा संकट खड़ा हो सकता है।
भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में विविध लैंगिक पहचानों को सम्मान दिया गया है। किन्नर, गंधर्व, यक्ष आदि को उपदेवताओं की श्रेणी में माना गया है। महाभारत जैसे ग्रंथों में शिखंडी का उल्लेख मिलता है, जिन्हें जन्म से स्त्री होते हुए भी पुरुष के रूप में पहचाना गया—इसे आज के संदर्भ में ट्रांस मेल के रूप में समझा जा सकता है। अर्जुन का बृहन्नला रूप और भगवान कृष्ण के विभिन्न रूप भी जेंडर फ्लुइडिटी की ओर संकेत करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में जेंडर की विविधता को स्वीकार किया गया था। भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत में ट्रांसजेंडर समुदाय की एक गहरी और ऐतिहासिक भूमिका रही है। पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में सदियों से ऐसे अनेक लोक-परंपराएँ मौजूद रही हैं, जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की भागीदारी अहम रही है। चाहे वह नकले हों, लोंडा डांस हो, किन्नौर क्षेत्र का रावूले परंपरा हो या अन्य सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ—इन सभी में जेंडर की विविधता को एक स्वाभाविक और सम्मानजनक रूप में स्वीकार किया गया है।
इन परंपराओं में कई बार पुरुष कलाकार स्त्री रूप धारण कर समाज के सामने प्रदर्शन करते थे, जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जेंडर की लचीलापन और विविधता का एक जीवंत उदाहरण था। यह दर्शाता है कि भारतीय समाज में जेंडर की समझ हमेशा से व्यापक और बहुआयामी रही है।
दुर्भाग्यवश, समय के साथ ये परंपराएँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। और इनके साथ ही ट्रांसजेंडर समुदाय की वह सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ रही है, जो सदियों से समाज का हिस्सा रही है। जब संस्कृति खत्म होती है, तो केवल परंपराएँ ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी पहचान और अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाते हैं।
यदि आज हम इन परंपराओं और इस समुदाय की पहचान को संरक्षित नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ उस समृद्ध विविधता से वंचित रह जाएंगी, जो भारत की असली ताकत है।
ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट बिल का एक और गंभीर दूरगामी दुष्प्रभाव स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी देखने को मिल सकता है। पिछले लगभग 35–40 वर्षों से भारत सरकार Ministry of Health and Family Welfare
National AIDS Control Organisation (NACO) के माध्यम से एचआईवी/एड्स और एसटीआई (Sexually Transmitted Infections) की रोकथाम के लिए व्यापक
टार्गेटेड इंटरवेंशन TI कार्यक्रम चला रही है। जो देशभर में विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से संचालित होते हैं।
इन कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण फोकस एमएसएम (Men who have Sex with Men) और ट्रांसजेंडर समुदाय रहा है, क्योंकि ये समुदाय एचआईवी संक्रमण के जोखिम के दृष्टिकोण से अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। लेकिन वर्तमान ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट बिल के कारण इन प्रयासों पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।
यदि कानून के माध्यम से जेंडर आइडेंटिटी और सेक्शुअलिटी को सीमित या नकार दिया जाता है, तो यह सीधे तौर पर उन समुदायों की पहचान को प्रभावित करता है, जिनके लिए ये स्वास्थ्य कार्यक्रम बनाए गए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पहचान को ही मान्यता नहीं मिलेगी, तो इन समुदायों के लोग इन कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी कैसे सुनिश्चित करेंगे? उनके सामने डर, असुरक्षा और अदृश्यता (invisibility) की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे वे इन सेवाओं से दूर हो सकते हैं।

