एक दिन के लिए मुझे किराए पर ले लो……
बाकायदा एक रेट लिस्ट भी जारी की है
कॉफी डेट पर जाना है? — ₹1500
साथ में मूवी देखनी है या डिनर करना है? — ₹2000
परिवार से मिलवाना है (झूठा पार्टनर बनकर)? — ₹3000
किसी शादी या इवेंट में साथ जाना है? — ₹4000
दिव्या नाम की एक पढ़ी-लिखी लड़की ने बेरोजगारी और तंगहाली से तंग आकर एक नया बिजनेस शुरू किया है—RENT ME FOR A DAY(मुझे एक दिन के लिए किराए पर लें)।
इस रेट लिस्ट का सबसे मार्मिक और डराने वाला पहलू जानते हैं क्या है? परिवार से मिलाने के ₹3000…और कॉफी पर साथ बैठने के ₹1500..।
पहली बार में इसे पढ़कर शायद हंसी आ जाए, लेकिन अगर इस पर गहराई से गौर करें, तो यह हंसने वाली बात नहीं, बल्कि हमारे समाज की दो सबसे बड़ी और कड़वी हकीकतों का एक साथ बेनकाब होना है।
एक नौजवान जब डिग्री हाथ में लेकर दर-दर भटकता है और हर तरफ से सिर्फ नाकामी हाथ लगती है, तो उसका स्वाभिमान और उम्मीदें अंदर से टूटने लगती हैं। जब पेट की भूख और बुनियादी जरूरतें सिर उठाने लगती हैं, तो इंसान अपनी इज्जत और जमीर को ताक पर रखकर ऐसे फैसले लेने को मजबूर हो जाता है जो कभी उसने ख्वाब में भी नहीं सोचे थे। यह दिव्या के किसी शौक का नतीजा नहीं, बल्कि एक मजबूर इंसान की बेबसी का चीखता हुआ सबूत है।
सोचिए, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां चारों तरफ भीड़ है, सोशल मीडिया पर हजारों दोस्त हैं, लेकिन दिल का हाल बयां करने के लिए या अपनी तन्हाई छुपाने के लिए लोगों को किराए के इंसानों’ की जरूरत पड़ रही है। लोग पैसे देकर कुछ घंटों के लिए एक नकली रिश्ता, एक झूठा साथ खरीद रहे हैं।
यह आईना है हमारी खोखली होती जा रही दुनिया का, जहां जज्बात और इंसानियत भी अब पैसों के तराजू में तोले जाने लगे हैं।
एक तरफ रोजगार की ये लाचारी है, और दूसरी तरफ अपनों के बीच रहकर भी अकेलेपन की ये खामोश बीमारी। समझ नहीं आता कि इस पोस्ट को देखकर दिव्या की मजबूरी पर तरस खाया जाए, या इस दौर के अकेलेपन पर मातम मनाया जाए।
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या वाक़ई हमारे समाज में रिश्तों की अहमियत सिर्फ एक रेट लिस्ट तक सिमट कर रह गई है?

