सिंघम बनने की चाह या तानाशाही का प्रदर्शन? गोपालगंज में एसपी बनाम विधायक की टकराहट
(पूर्व सैनिक सह पत्रकार संतोष राय)
गोपालगंज में इन दिनों कानून व्यवस्था से ज्यादा चर्चा एसपी विनय तिवारी की कार्यशैली को लेकर है।
कभी सुशांत सिंह राजपूत मामले में मुंबई जाकर क्वारंटीन किए जाने से राष्ट्रीय सुर्खियों में आए तिवारी जी अब गोपालगंज में खुद को “सिंघम” साबित करने की कोशिश में नजर आ रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यह सख्ती कानून के दायरे में है या फिर एकतरफा तानाशाही का प्रदर्शन?
हालिया घटनाओं में जेडीयू विधायक अमरेंद्र पांडे उर्फ पप्पू पांडे और एसपी के बीच टकराव खुलकर सामने आया है।
पुलिस की कार्रवाई को माफिया विरोधी अभियान बताया जा रहा है, लेकिन जमीन पर स्थिति कुछ और ही कहानी कहती है।
आरोप है कि बिना संतुलित जांच के चुनिंदा लोगों को “रेडार” पर लिया जा रहा है और गिरफ्तारी की जल्दबाजी दिखाकर माहौल बनाया जा रहा है।
यह तरीका कानून की प्रक्रिया से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन जैसा लगता है।
गोपालगंज में वर्षों से जमीन विवाद और कब्जे के मामले रहे हैं।
ऐसे मामलों में कार्रवाई शिकायत और प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी अधिकारी की व्यक्तिगत छवि गढ़ने के लिए। लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि एसपी तिवारी सख्ती दिखाकर “तानाशाह अफसर” की भूमिका में आ गए हैं। पुलिसिया दबाव, त्वरित गिरफ्तारी और मीडिया में संदेश—इन सबका मिश्रण प्रशासनिक कार्रवाई से ज्यादा छवि निर्माण का प्रयास लगता है।
विधायक पप्पू पांडे को क्षेत्र में बाहुबली छवि वाला नेता माना जाता रहा है।
लेकिन यह भी सच है कि वे लगातार चुनाव जीतते आए हैं और जनता का समर्थन उनके साथ रहा है।
ऐसे में यदि उनके खिलाफ कार्रवाई होती है तो वह पूरी तरह पारदर्शी और ठोस साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए।
वरना यह राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव बनकर रह जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस का काम न्याय सुनिश्चित करना है या फिर “सिंघम” बनकर डर पैदा करना?
गोपालगंज की जनता देख रही है कि कार्रवाई का पैमाना क्या है—कानून या फिर तानाशाही।
अगर यही रुख जारी रहा तो यह टकराव सिर्फ एक विधायक और एसपी तक सीमित नहीं रहेगा।
बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करेगा।
आज जरूरत है संतुलित कार्रवाई की, न कि एकतरफा दबाव की। कानून का डंडा तभी असरदार होता है।
जब वह न्यायपूर्ण हो, वरना वही डंडा तानाशाही का प्रतीक बन जाता है।
गोपालगंज में फिलहाल यही बहस तेज है—क्या यह माफिया विरोधी अभियान है या फिर तिवारी जी का तानाशाही अंदाज?

